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BIS ने चेताया, बड़े क्रिप्टो जायंट्स अब बैंकों की तरह कर रहे हैं काम, लेकिन बिना रूलबुक के

  • BIS पेपर में कहा गया सबसे बड़ी क्रिप्टो प्लेटफ़ॉर्म्स shadow banks की तरह काम करती हैं
  • 'Earn' products डिपॉजिट्स जैसे हैं, लेकिन इनमें insurance या central bank का backstop नहीं होता
  • लेखकों ने Celsius, FTX और अक्टूबर 2025 की $19B फ्लैश क्रैश का जिक्र किया

Bank for International Settlements (BIS) का कहना है कि सबसे बड़ी क्रिप्टो प्लेटफॉर्म्स अब बैंकों और प्राइम ब्रोकर्स की तरह काम कर रही हैं। ये जमा जैसे फंड्स लेती हैं, लेकिन इन पर बैंकिंग नियमों जैसा कोई प्रूडेंशियल रेग्युलेशन लागू नहीं है, जिससे क्रिप्टो शैडो बैंकिंग का रिस्क बढ़ रहा है।

नई Financial Stability Institute (FSI) की रिपोर्ट ने इनकी पहचान “मल्टीफंक्शन क्रिप्टोएसेट इंटरमीडियरीज” के रूप में की है। रिपोर्ट के लेखक मानते हैं कि इन फर्म्स के लिए बैंकिंग जैसी कैपिटल, लिक्विडिटी, गवर्नेंस और स्ट्रेस टेस्टिंग के नियम होना जरूरी हैं, जैसे रेग्युलेटेड बैंकों पर लागू होते हैं।

क्रिप्टो की शैडो बैंकिंग की समस्या

इस 38-पेज की रिपोर्ट में बताया गया है कि यील्ड और earn प्रोग्राम्स में कस्टमर के एसेट्स का ओनरशिप प्रॉवाइडर को ट्रांसफर हो जाती है। इस स्ट्रक्चर से ऐसी शॉर्ट-टर्म रिडीमेबल लाइबिलिटीज बनती हैं, जो बैंक डिपॉजिट की तरह बिहेव करती हैं। क्रिप्टो होल्डर्स के लिए डिपॉजिट इंश्योरेंस या सेंट्रल बैंक की लिक्विडिटी लाइन जैसी कोई सुविधा नहीं है।

मार्जिन लेंडिंग, डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग और टोकन इश्यूअंस इसके ऊपर और ज्यादा क्रेडिट और मार्केट रिस्क बढ़ाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ये सभी मिलकर वही maturity और liquidity ट्रांसफॉर्मेशन क्रिएट करते हैं, जो हमेशा से शैडो बैंकिंग से जुड़ा रहा है। लेकिन इससे जुड़ी कोई सेफगार्ड्स यहां लागू नहीं होती हैं।

रिपोर्ट में 2022 में Celsius Network और FTX के फेल होने को शुरुआती चेतावनी बताया गया है। लेखक इसमें अक्टूबर 2025 की फ्लैश क्रैश भी जोड़ते हैं। इस एक इवेंट में लगभग $19 बिलियन के leveraged पॉजिशन्स खत्म हो गए थे।

पॉलिसी गैप्स और क्रॉस-बॉर्डर चुनौतियां

ट्रांसपेरेंसी आज भी सबसे बड़ी कमजोरी है। रिसर्चर्स ने नवंबर 2025 से मार्च 2026 के बीच कई बड़े प्रॉवाइडर्स के टर्म्स और कंडीशंस देखे। इनमें से कई अब भी फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स जारी नहीं करते या ये नहीं बताते कि कस्टमर के एसेट्स का इस्तेमाल कैसे किया जाता है।

लेखकों का सुझाव है कि एंटिटी-बेस्ड और एक्टिविटी-बेस्ड रेग्युलेशन दोनों का मिश्रण होना चाहिए। क्रॉस-बॉर्डर सुपरवाइजरी कोऑपरेशन लेंडिंग और बॉरोइंग एक्टिविटीज़ को कवर करेगा, जो मौजूदा फ्रेमवर्क से बाहर हैं। वे यह भी मानते हैं कि लिमिटेड सुपरवाइजरी रिसोर्सेस और कमजोर रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड्स की वजह से इफेक्टिव ओवरसाइट अब भी मुमकिन नहीं हो पाई है।

इंटरकनेक्टेडनेस से रिस्क और बढ़ जाती है। कई इंटरमीडियरी एक-दूसरे के लिए ट्रेड, लेंडिंग और कस्टडी सर्विस देती हैं। एक बड़ी फर्म में स्ट्रेस सेक्टर में कुछ ही दिनों में फैल सकता है। इंस्टिट्यूशन इनवेस्टर्स पहले ही अपनी कस्टडी एक्सचेंज से बाहर शिफ्ट करने लगे हैं ताकि एक्सपोजर कम हो।

बड़े क्रिप्टो फर्म्स अब ट्रेडिशनल फाइनेंस में भी गहराई से घुस रही हैं। BIS की रिपोर्ट इशारा करती है कि रेग्युलेटर्स इन्हें सिर्फ ट्रेडिंग वेन्यू की तरह नहीं देख सकते। अब सवाल ये है कि नेशनल अथॉरिटीज़ कितनी जल्दी डाइग्नोसिस से बाइंडिंग रूल्स पर शिफ्ट करती हैं।


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