New York Stock Exchange अमेरिका के इक्विटी मार्केट इन्फ्रास्ट्रक्चर में दशकों बाद सबसे बड़ी बदलाव की नींव रख रहा है।
एक्सचेंज ने टोकनाइज्ड सिक्योरिटीज़ को सपोर्ट करने और 24/7 ट्रेडिंग सक्षम करने का प्लान किया है। इसका मकसद है कि कैसे स्टॉक्स ट्रेड होते हैं, सेटल होते हैं, और ग्लोबल फाइनेंसियल सिस्टम में जानकारी अब्सॉर्ब होती है, उसमें मॉडर्नाइजेशन लाया जाए।
अगर यह बदलाव सफल रहा, तो इसका असर प्राइस डिस्कवरी, सेटलमेंट रिस्क, लिक्विडिटी बिहेवियर, और इन्वेस्टर साइकॉलजी पर पड़ सकता है। यह US मार्केट्स में कई चीज़ों को बदल देगा।
NYSE असल में क्या प्रपोज कर रहा है
NYSE का प्लान एक ऐसा ब्लॉकचेन-बेस्ड प्लेटफॉर्म बनाना है जो परंपरागत सिक्योरिटीज़ के टोकनाइज्ड वर्ज़न (जैसे स्टॉक्स और ETF) को सपोर्ट कर सके। ये टोकनाइज्ड सिक्योरिटीज़ असली, कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त शेयर होंगी, जो underlying asset द्वारा 1-टू-1 बैक होंगी और मौजूदा अमेरिका सिक्योरिटीज़ कानूनों के तहत रेग्युलेट होंगी।
एक टोकनाइज्ड शेयर आज भी पब्लिक कंपनी में ओनरशिप दिखाता है, और इसके सारे आर्थिक और गवर्नेंस अधिकार वैसे ही हैं जैसे पारंपरिक शेयर में होते हैं। फर्क बस इतना है कि ओनरशिप कैसे रिकॉर्ड होती है और ट्रेड्स कैसे सेटल होते हैं।
सबसे खास बात, NYSE एकदम से मौजूदा मार्केट को रिप्लेस नहीं कर रहा है। टोकनाइज्ड सिक्योरिटीज़ को पारंपरिक शेयर के साथ-साथ ऑपरेट करने के लिए डिजाइन किया गया है। समय के साथ दोनों फॉर्मेट में फंजिबिलिटी रहेगी।
यानी ये एक पैरेलल सिस्टम होगा, और यूज़र्स पर कोई जबरन माइग्रेशन नहीं है।
मौजूदा stock market स्ट्रक्चर में पुरानी कमजोरी नजर आ रही है
कई दशकों की टेक्नोलॉजिकल प्रगति के बावजूद, अमेरिका की इक्विटी मार्केट्स अब भी एक layered structure पर निर्भर हैं जो प्री-डिजिटल एरा के लिए बनाई गई थी। ट्रेडिंग, क्लियरिंग, सेटलमेंट, और कस्टडी अलग-अलग entities के द्वारा होती है और हर कोई अपनी खुद की लेजर रखता है।
इस स्ट्रक्चर में कई प्रॉब्लम्स आती हैं। सेटलमेंट विंडो के दौरान कैपिटल फंसी रहती है। Counterparty रिस्क ट्रेड्स के पूरी तरह क्लियर होने तक बना रहता है। इंटरमीडियरी के बीच रेन्किलिएशन में कॉस्ट और ऑपरेशनल रिस्क बढ़ता है।
सबसे जरूरी बात, मार्केट्स फिक्स्ड ट्रेडिंग आवर्स से बंधे रहते हैं, जबकि इनफार्मेशन ग्लोबली और लगातार फ्लो होती रहती है।
ये दिक्कतें हमेशा रिटेल इन्वेस्टर्स को दिखाई नहीं देतीं। लेकिन हर दिन यही वोलटिलिटी, लिक्विडिटी और मार्केट बिहेवियर को शेप देती हैं।
Tokenization से इंफ्रास्ट्रक्चर लेवल पर सब बदल गया
टोकनाइजेशन इन सभी इनेफिसिएंसीज़ को टारगेट करता है। डिजिटल लेजर पर सिक्योरिटीज़ को रिप्रेजेंट करके, ओनरशिप अपडेट्स और सेटलमेंट लगभग रियल टाइम में हो सकते हैं। ट्रेडिंग और सेटलमेंट को अब अलग-अलग प्रोसेस की तरह जोड़ने की जरूरत नहीं होगी।
इससे सेटलमेंट रिस्क कम हो जाता है क्योंकि डिलीवरी और पेमेंट एटॉमिकली हो सकते हैं। इसके अलावा, कैपिटल एफिशिएंसी भी बेहतर होती है, क्योंकि कोलेटरल और कैश अब ट्रेड्स क्लियर होने का इंतजार करते हुए लॉक नहीं रहते।
संस्थाओं के लिए, इसका बैलेंस शीट पर भी असर होता है। पूरी मार्केट के लिए, यह पोस्ट-ट्रेड प्रोसेस को सिंपल बनाता है, जो पहले बहुत कॉम्प्लेक्स हो गया था।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि टोकनाइजेशन किसी स्टॉक के नेचर को नहीं बदलता। यह सिर्फ इस सिस्टम को बदलता है कि स्टॉक ओनरशिप को कैसे प्रोसेस किया जाता है।
टोकनाइज्ड मार्केट जो कंटीन्यूस ऑपरेशन के लिए बनी है, वह इस डाइनैमिक को बदल देती है। अब ट्रेडिंग वीकेंड्स या ओवरनाइट घंटों के लिए नहीं रुकती। प्राइस डिस्कवरी लगातार चलती रहती है, यह किसी खास टाइम बॉक्स में नहीं रहती।
यह बहुत इम्पॉर्टेंट इम्प्लीकेशन्स लेकर आता है। आज जब अर्निंग्स, जियोपॉलिटिकल न्यूज या मैक्रोइकोनॉमिक डेटा मार्केट ऑवर्स के बाहर आता है, तो प्राइस एडजस्टमेंट में देरी होती है और फिर ओपनिंग के समय यह शार्प मूव में बदल जाती है।
कुल मिलाकर, कंटीन्यूस ट्रेडिंग में प्राइसेस धीरे-धीरे एडजस्ट हो सकती हैं जैसे-जैसे इंफॉर्मेशन फैलती है, जिससे आर्टिफिशियल शॉक पॉइंट्स कम हो जाते हैं।