Harvard के इकोनॉमिस्ट Kenneth Rogoff का मानना है कि Chinese yuan अगले पांच सालों में एक ग्लोबल रिजर्व करेंसी बन जाएगा। वह कहते हैं कि राष्ट्रपति Xi Jinping का खुले तौर पर yuan के इंटरनेशनलाइज़ेशन का समर्थन करना एक बड़ा बदलाव है।
Rogoff का कहना है कि दुनियाभर के इन्वेस्टर्स US Dollar से अलग वैरायटी में निवेश करने के लिए बेताब हैं, इसी वजह से China का यह कदम सही समय पर है।
China का रिजर्व स्टेटस तक सफर
हाल ही में South China Morning Post के साथ इंटरव्यू में Rogoff ने बताया कि China को किन जरूरी कदमों की ज़रूरत है। Beijing को अपनी सरकार के बॉन्ड मार्केट्स विदेशी इन्वेस्टर्स के लिए खोलने होंगे। साथ ही, इंटरनेशनल पार्टिसिपेशन को सपोर्ट करने के लिए फॉरवर्ड मार्केट्स और इंटरेस्ट रेट स्वैप्स की भी जरूरत होगी।
Rogoff ने नोट किया कि पूरी तरह से खुले कैपिटल मार्केट्स की जरूरत नहीं है। US ने भी 1970s तक विदेशी निवेश पर कई पाबंदियां लगाए रखी थीं। उसके बावजूद वो उस समय तक दुनिया की डॉमिनेंट रिजर्व करेंसी था।
China को SWIFT सिस्टम से स्वतंत्र फाइनेंशियल इंफ्रास्ट्रक्चर भी तैयार करना होगा। Rogoff के मुताबिक, आज की ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी से मौजूदा सिस्टम्स को बहुत कम लागत पर डुप्लिकेट किया जा सकता है। देश का Cross-border Interbank Payment System पहले से ही इस दिशा में मजबूत base बना चुका है।
Dollar की वैल्यू घटने में Crypto की भूमिका
Rogoff ने यह भी बताया कि क्रिप्टोकरेन्सी कैसे करेंसी कॉम्पिटीशन को बदल रही है। उन्होंने बताया कि ग्लोबल अंडरग्राउंड इकोनॉमी कुल आउटपुट का करीब 20% है, यानी कम से कम $20 ट्रिलियन।
क्रिप्टोकरेन्सी, खासकर stablecoins, ने अवैध ट्रांजेक्शंस में पहले ही बड़ा हिस्सा हासिल कर लिया है। कभी इस जगह पर physical cash का बोलबाला था। अब डिजिटल एस्सेट्स तेज़ और मुश्किल से ट्रेस होने वाले विकल्प बन चुके हैं।
स्टेबलकॉइन्स पर रेग्युलेटरी शिकंजा कस सकता है
हालांकि Rogoff ने चेतावनी दी है कि क्रिप्टो कभी भी लीगल इकोनॉमी में Dollar की जगह नहीं ले सकेगा। सरकारों के पास यह रोकने के लिए काफी रेग्युलेटरी पावर है।
उन्होंने US Genius Act की स्टेबलकॉइन रेग्युलेशन को जरूरत से ज्यादा लिबरल बताया। स्टेबलकॉइन्स एक बार अपने इशूअर से बाहर जाने के बाद ट्रेस करना मुश्किल हो जाता है। Rogoff ने अनुमान लगाया कि आने वाले समय में रूल्स सेंट्रल बैंक डिजिटल करंसी के रेगुलेशन जैसे हो जाएंगे।
करेंसी डॉमिनेंस की रेस तेज़ हो गई है। Europe और China दोनों ही US के प्रतिबंधों से बचने के लिए अपने खुद के स्वतंत्र फाइनेंशियल सिस्टम्स बना रहे हैं।





