AI के जॉब्स पर खतरे का सबसे ज्यादा असर युवाओं पर पड़ता है, International Monetary Fund (IMF) की प्रमुख Kristalina Georgieva ने सोमवार को Bangkok में चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि वे रूटीन रोल्स, जहां से ज्यादातर करियर शुरू होते हैं, सबसे पहले गायब हो रहे हैं।
Georgieva का मानना है कि AI आखिरकार ग्लोबल लेवल पर करीब 40% नौकरियों को प्रभावित करेगा। हालांकि, IMF के US रिसर्च में कुल मिलाकर जॉब्स बढ़ी हैं, ज्यादातर लोअर-पेड वर्क में।
युवाओं की नौकरियां खतरे में सबसे पहले क्यों?
IMF और World Bank की Annual Meetings में बोलते हुए Georgieva ने AI की तुलना ऐसे सूनामी से की जो धीरे-धीरे बढ़ती है लेकिन टकराती जरूर है।
IMF के मुताबिक, एडवांस्ड अर्थव्यवस्था वाले देशों में करीब 60% जॉब्स पर AI का असर पड़ेगा, जबकि लो-इनकम देशों में यह आंकड़ा 23% है। उन्होंने बताया कि गरीब देशों को सिर्फ इसीलिए सुरक्षित समझा जा रहा है क्योंकि AI वहां तक अभी पहुंचा नहीं है।
इसी बीच, IMF की US रिसर्च में सामने आया है कि रूटीन जॉब्स तेजी से कम हो रही हैं। ज्यादातर नई नौकरियां डेटा सेंटर और सर्विस सेक्टर जैसी लोअर-पेड रोल्स में हैं, जैसा कि Mark Cuban की चेतावनी थी कि किसे फायदा मिलता है।
“सबसे पहले चिंता युवाओं की होनी चाहिए, जो लेबर मार्केट में आ रहे हैं। आमतौर पर वे इन रूटीन, रिपेटिटिव जॉब्स के जरिए शुरुआत करते हैं और आगे बढ़ते हैं, लेकिन अगर ये जॉब्स ही खत्म हो जाएं तो मुझे नहीं लगता कोई भी युवा सिर्फ कॉफी शॉप में बारिस्टा बनना चाहेगा…”
Kristalina Georgieva, IMF मैनेजिंग डायरेक्टर, ने कहा।
क्या करियर का पहला पायदान टूट रहा है?
Singapore के President Tharman Shanmugaratnam ने इसी पैनल में एंट्री-लेवल हायरिंग का मुद्दा उठाया।
“रोजगार में पहली सीढ़ी, यानी ग्रेजुएट होने के बाद पहली जॉब, की डिमांड अब कम होती जा रही है। इसका सबूत साफ नजर आता है। सबसे ज्यादा असर उन सेक्टर्स में है जहां AI का इस्तेमाल सबसे ज्यादा होता है, जैसे कि टेक सेक्टर।”
Tharman Shanmugaratnam, President of Singapore, ने कहा।
Tharman का कहना है कि इस पहली जॉब का छूटना सिर्फ एक साल की स्किल्स से ज्यादा नुकसान करता है, ये फ्यूचर पर भरोसे को भी कमजोर बनाता है।
पेरोल डेटा भी उनकी चिंता को सही साबित करता है। जिन जॉब्स में सबसे ज्यादा AI एक्सपोजर है, वहां 22 से 25 साल के युवाओं की रोजगार दर नवंबर 2022 से अप्रैल 2026 के बीच करीब 12% गिर गई।
इसके विपरीत, उसी उम्र के युवाओं की संख्या सबसे कम AI-एक्सपोज्ड जॉब्स में करीब 7% बढ़ी। वहीं, 31 साल और उससे अधिक उम्र के वर्कर्स में लगभग कोई फर्क नहीं दिखा, Stanford और ADP डेटा के अनुसार।
रिसर्चर्स ने इस गिरावट की वजह कम भर्ती को बताया है, ना कि छंटनी को।
सितंबर में US Census Bureau की एक रिपोर्ट में सामने आया कि जिन स्टूडेंट्स की पढ़ाई AI से जुड़ी थी, उनकी शुरुआती सैलरी 13% तक गिर गई। इसमें आधा नुकसान ग्रेजुएट्स के रेस्टोरेंट, रिटेल जैसे कम सैलरी वाले सेक्टर्स में जाने से हुआ।
क्या कॉलेज डिग्री अभी भी सेफ है?
Tharman ने भी कहा कि US में ग्रेजुएट्स की डिमांड सौ साल में पहली बार घटी है।
Federal Reserve Bank of New York के डेटा में भी यही ट्रेंड दिखता है। ताजा ग्रेजुएट्स की 2026 जून में बेरोजगारी करीब 5.7% रही, जबकि सभी वर्कर्स के लिए ये 4.1% के आसपास थी।
इतिहास में अभी तक ताजा ग्रेजुएट्स की बेरोजगारी दर वर्कफोर्स के मुकाबले कम थी। लेकिन 2018 से ये ट्रेंड उलट गया है। अप्रैल 2025 में ये गैप 1.8 प्रतिशत अंक तक पहुंच गया, जो 1990 के बाद सबसे ज्यादा है।
क्या यह शुरुआती चेतावनी है या बेवजह डर?
Stanford के रिसर्चर्स बताते हैं कि उनकी स्टडी सिर्फ डेटा दिखाती है, यह AI की वजह से गिरावट का सबूत नहीं है। वहीं Andreessen Horowitz के पार्टनर David George समेत कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि AI जॉब्स पैनिक की थ्योरी के पास अभी ठोस सबूत नहीं हैं।
फिर भी, Tharman ने सरकारों से अपील की है कि COVID के समय जैसी भर्ती में सहायता अब स्थायी कर दें और कंपनियों को फ्रेश ग्रेजुएट्स लेने पर इंसेंटिव दें।
Georgieva ने माना कि आज से पांच साल बाद जॉब मार्केट कैसा होगा, इसका किसी के पास जवाब नहीं है। लेकिन जो युवा अभी एंटर कर रहे हैं, उनके लिए हायरिंग डेटा में दिक्कत की शुरुआत दिख रही है।











